ओपी राजभर के बयान से फिर शुरू हुई बहस
उत्तर प्रदेश को छोटे राज्यों में बांटने की मांग एक बार फिर राजनीतिक चर्चा में है। यूपी सरकार में मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के प्रमुख ओपी राजभर ने रविवार को दावा किया कि आने वाले समय में उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों में बांटा जाएगा।
अंबेडकरनगर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए राजभर ने प्रस्तावित क्षेत्रों के नाम पूर्वांचल, मध्यांचल, बुंदेलखंड और हरित प्रदेश बताए। उन्होंने यह भी दावा किया कि अलग पूर्वांचल राज्य बनने पर वहां पहला मुख्यमंत्री राजभर समुदाय से होगा।
हालांकि, केंद्र सरकार या बीजेपी की ओर से उत्तर प्रदेश को चार राज्यों में बांटने की ऐसी किसी मौजूदा योजना की घोषणा नहीं की गई है। इसलिए राजभर के बयान को फिलहाल उनके राजनीतिक दावे के तौर पर ही देखा जा रहा है।
2011 में मायावती सरकार ने पारित किया था प्रस्ताव
उत्तर प्रदेश के विभाजन की दिशा में सबसे ठोस कदम नवंबर 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती की सरकार के दौरान उठाया गया था।
21 नवंबर 2011 को यूपी विधानसभा ने राज्य को चार हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव पारित किया था। इसमें पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश और पश्चिम प्रदेश बनाने की बात कही गई थी। प्रस्ताव हंगामे के बीच ध्वनिमत से पारित हुआ था।
मायावती सरकार का तर्क था कि उत्तर प्रदेश का आकार बहुत बड़ा है और छोटे राज्यों के जरिए प्रशासन तथा विकास को ज्यादा प्रभावी बनाया जा सकता है। प्रस्ताव बाद में केंद्र सरकार को भेजा गया, लेकिन इसे आगे नहीं बढ़ाया गया।
उस समय चार हिस्सों का नक्शा कैसा था?
2011 के प्रस्ताव में यूपी को मोटे तौर पर इन चार हिस्सों में बांटने की योजना थी:
पश्चिम प्रदेश: पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बड़े हिस्से को शामिल करने का प्रस्ताव था। इसमें मेरठ, सहारनपुर, आगरा, मथुरा, गाजियाबाद, गौतम बुद्ध नगर समेत कई जिले शामिल थे।
अवध प्रदेश: मध्य यूपी का क्षेत्र, जिसमें लखनऊ, उन्नाव, रायबरेली, सीतापुर, हरदोई, बाराबंकी, अयोध्या, सुल्तानपुर, गोंडा और बहराइच जैसे जिले शामिल थे।
बुंदेलखंड: झांसी, जालौन, ललितपुर, हमीरपुर, महोबा, बांदा और चित्रकूट जैसे जिलों को इसमें शामिल किया गया था। बुंदेलखंड का क्षेत्र मध्य प्रदेश तक भी फैला हुआ है, इसलिए अलग राज्य की मांग में अंतरराज्यीय पहलू भी जुड़ता है।
पूर्वांचल: पूर्वी यूपी के बड़े हिस्से को शामिल किया गया था, जिसमें वाराणसी, प्रयागराज, गोरखपुर, गाजीपुर, बलिया, आजमगढ़, मऊ, जौनपुर, मिर्जापुर और सोनभद्र समेत कई जिले प्रस्तावित थे।
ध्यान देने वाली बात यह है कि ये 2011 के प्रस्ताव से जुड़ी प्रस्तावित सीमाएं थीं। इन्हें आज के किसी आधिकारिक नए राज्य का नक्शा नहीं माना जा सकता।
2011 के बाद क्या हुआ?
मायावती सरकार का प्रस्ताव विधानसभा से पास होने के बाद केंद्र को भेजा गया था। केंद्र सरकार ने बाद में इस प्रस्ताव से जुड़े प्रशासनिक और वित्तीय पहलुओं पर जानकारी मांगी थी।
2014 में केंद्र सरकार ने लोकसभा में बताया था कि यूपी सरकार ने 23 नवंबर 2011 को विधानसभा के चार राज्यों में विभाजन संबंधी प्रस्ताव को केंद्र को भेजा था। केंद्र ने यह भी कहा था कि नए राज्य बनाने के मामलों में व्यापक प्रभावों और सभी संबंधित पहलुओं पर विचार किया जाता है।
लेकिन प्रस्ताव पर आगे कोई राज्य गठन नहीं हुआ।
क्या यूपी को बांटना इतना आसान है?
उत्तर प्रदेश को अलग-अलग राज्यों में बांटने के लिए केवल विधानसभा का प्रस्ताव पर्याप्त नहीं है।
संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्य के गठन या किसी राज्य की सीमा और क्षेत्र में बदलाव का अधिकार संसद के पास है। ऐसे विधेयक को संसद में पेश करने के लिए राष्ट्रपति की सिफारिश जरूरी होती है। संबंधित राज्य विधानसभा से उसके विचार मांगे जाते हैं, लेकिन उसकी सहमति अंतिम रूप से अनिवार्य नहीं है।
इसलिए यदि भविष्य में यूपी के पुनर्गठन का कोई प्रस्ताव आता है, तो उसे संवैधानिक प्रक्रिया से गुजरना होगा।
फिर क्यों चर्चा में आया चार राज्यों का मुद्दा?
ओपी राजभर के हालिया बयान ने पुराने प्रस्ताव को फिर राजनीतिक चर्चा में ला दिया है। 2011 में जहां नाम पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश और पश्चिम प्रदेश थे, वहीं राजभर ने इस बार पूर्वांचल, मध्यांचल, बुंदेलखंड और हरित प्रदेश का जिक्र किया है।
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि इन नामों और क्षेत्रों को लेकर कोई औपचारिक सरकारी प्रस्ताव तैयार किया गया है या नहीं। इसलिए इस मुद्दे को फिलहाल राजनीतिक बयान और पुराने राज्य-पुनर्गठन प्रस्ताव की वापसी के रूप में देखना ज्यादा उचित है।
जरूरी सूचना: उत्तर प्रदेश के चार राज्यों में विभाजन को लेकर ओपी राजभर के बयान को आधिकारिक सरकारी निर्णय के रूप में प्रस्तुत न किया जाए। प्रस्तावित क्षेत्रों की सीमाएं भी भविष्य में किसी आधिकारिक पुनर्गठन की स्थिति में अलग हो सकती हैं।